Karna

This poem depicts the scene from Mahabharata epic when Karna was killed.

गिरा जो रुधिर वीर का धरा पर
माधव को भी ये एहसास हुआ
कि जिसकी खातिर उतरे थे रण में
उसी धर्म का उनसे उपहास हुआ

श्रेष्ठ था युद्धकौशल में वो
दानशीलता के गुण से विख्यात हुआ
दान-धर्म ही बना मौत का कारण
प्रभु ये कैसा अभिशाप हुआ

एक ही माँ की कोख से जन्मे सब
कुछ पांडव कहलाये, वो सूतपुत्र बदनाम हुआ
अरे निहत्थे पर बाण चलकर
पार्थ ! तुझे ये कैसा अभिमान हुआ

दिनकर क्यों छुपते हो अब बदल के पीछे
पितृधर्म का तुमसे है संहार हुआ
ज्ञात होते हुए भी देवराज का छल
क्यों कवच-कुण्डल देने को पुत्र ये लाचार हुआ

एक मित्र की खातिर लड़ा जो कुटुंब से
ऐसे योद्धा की मृत्यु का साक्षी पूरा इतिहास हुआ
श्याम! जिसकी खातिर उतरे थे तुम रण में
उसी धर्म का तुमसे उपहास हुआ

ज़िन्दगी की मैयत

ज़िन्दगी और मैयत – कहने को तो ये दोनों शब्द लगभग एक दूसरे के विपरीत हैं किन्तु उस रात मैंने ज़िन्दगी की मैयत निकलते देखी| बात उन दिनों की है जब  कोरोना नामक एक दानव का डर हर मनुष्य के भीतर समाया हुआ था | भय के मारे सभी अपने-अपने घरों के भीतर दुबके बैठे थे | ये दानव इतना बलशाली था कि ‘ गो कोरोना , कोरोना गो ‘ जैसे मंत्रो का भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था | सभी को बस ‘वैक्सीन ‘ नामक अस्त्र की तलाश थी जो इस दानव का विनाश कर सकता था | अस्त्र के लिए सभी ‘डब्ल्यू एच ओ ‘ की तपस्या करने में जुटे हुए थे | एक ओर जहाँ पूरा देश इतना विचलित था , वहीं मैं बिल्कुल निर्भीक होकर घोड़े बेचकर सो रहा था |

अचानक मेरी आँख खुली और मैंने स्वयं को एक अलग वातावरण में पाया | नहीं, फिल्मों की तरह यहाँ कोई कोहरा नहीं छाया था अपितु दिखने में तो सब कुछ पहले जैसा ही था | बस मानसिक वातावरण भिन्न था | सारा कोहरा मानो मेरे दिमाग के भीतर समा गया हो | कोई भी विचार बिल्कुल भली – भाँति नहीं आ रहा था | मैं बिस्तर से उठा और पानी पीने के लिए रसोई की तरफ चल दिया | किंतु पानी की एक घूँट ने तो तरह – तरह के विचारों का पूरा सागर मेरे अंदर कहीं प्रकट कर दिया था | इस उफनते सागर पर बाँध बनाने के मकसद से मैं सिगरेट – लाइटर लेकर छत की तरफ चल दिया |

छत पर शान्ति थी। सच कहुँ तो सन्नाटा ! मेरे अंदर उठता सवालों का भीषण तूफ़ान और छत का सन्नाटा मानो एक दूसरे का खालीपन मिटाने का प्रयास कर रहे थे। तभी मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी।  मैंने नीचे झाँका तो एक भीड़ इकठ्ठा हो रखी थी। सभी ने सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे।  एक शय्या थी , जिसके ऊपर कोई शख्स सफ़ेद चादर ओढ़े लेटा हुआ था।  मालूम होते हुए भी मैंने चिल्लाकर पूछ ही लिया, ” क्या हो रहा है यहाँ ? “।  मगर किसी भी इंसान ने मेरी तरफ नहीं देखा।  ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मेरी आवाज़ उन तक पहुंची ही नहीं। मै दोबारा पूछने वाला था कि कोई बोला, ” दिखाई नहीं देता क्या ? मैयत निकाली जा रही है।  ” आवाज़ सुनकर मै चौंक गया।  काफ़ी जानी पहचानी लग रही थी। शायद मेरी ही थी।  अब मुझे घबराहट होने लगी थी।  आवाज़ अर्थी के नीचे से आयी थी।  मेरे अंदर डर की एक लहर दौड़ गयी।

” किसकी? ” मैंने फिर पूछा। अब मेरे पसीने छूट रहे थे। ” तुम्हारी ” अब मुझे पक्का यकीन हो गया था कि आवाज़ वहीं से आ रही थी जहाँ मुझे शक था।

” पर मैं तो यहाँ हूँ। तुम कौन हो? ” मेरी आवाज़ कांपने लगी थी।

” तुम्हारी ज़िन्दगी। और ये तुम्हारी ज़िन्दगी की मईयत्त निकाली जा रही है। ” जवाब सुनकर मैं चौंक गया।

” ज़िन्दगी की मईयत्त ? ये क्या होता है ? “

” हा, हा , हा ” अब वो शख्स हँसने लगा था। ” तुम जानते हो ये क्या होता है। हर रोज़ तुम खुद ही तो निकालते हो तुम्हारी ज़िन्दगी की मईयत्त। बाकी लोगों की तरह। फिर आज क्यों अजीब सा लग रहा है तुम्हे ?”

” मैं कुछ समझा नहीं। “

” समझने के लिए वक़्त ही कहाँ है तुम्हारे पास ! ” उसने कटाक्ष करते हुए मुझसे कहा।

” माफ़ करना ? “

” सारा वक़्त तो तुम कंप्यूटर स्क्रीन के सामने गुज़ार देते हो। “

” पर वो तो मेरा काम है।  “

” और काम के बाद ? तब तो कुछ वक़्त अपनी ज़िन्दगी के साथ गुज़ार सकते हो। पर नहीं ! तुम्हे वो समय भी अपने फ़ोन के साथ ही बिताना है मेरे साथ नहीं। “

” तुम्हारे साथ? “

” हाँ मैं ही तो हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी।  “

” तो तुम्हारा कहना है कि मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, यानि कि तुम्हारी , हर रोज़ मैयत निकालता हूँ ? ” मैंने कुछ देर पश्चात सोचकर कहा।

” हाँ।  और क़त्ल भी तुम ही करते हो। “

” क़त्ल ? ये क्या बोल रहे हो तुम ? “

” लो कातिल अब अपने क़त्ल को ही भूलने लगे ! हाय ! अब तो क़त्ल का इलज़ाम भी हमीं पर दाल दो। ” उसने शायराना अंदाज़ में मुझसे कहा।

” देखो मजाक बंद करो। “

” सपने देखते हो ? ” उसने अचानक से पूछा।

” हाँ सब देखते हैं। “

” तो उन्हें पूरा क्यों नहीं करते ? तुम जानते हो कि तुम्हारे सपने ही एकमात्र ज़रिया हैं मुझ तक पहुंचने के ? “

” मैं कोशिश करता हूँ पूरा करने की “

” तुम बस शुरुवात करते हो।  पूरा नहीं। “

” ऐसी बात नहीं है।  “

” बात ऐसी ही है। अरे तुम तो आजकल नींद में देखा हुआ सपना पूरा नहीं करते।  पहले करते थे।  अगर आँख खुल जाती थी तो वापस सो जाते थे सपना पूरा करने के लिए।  पर अब देखो तुम्हे। “

मेरे पास कहने को कुछ था नहीं।  मैं बस वहाँ भीगी बिल्ली बने हुए , मुँह लटकाये हुए उसकी बातें सुने जा रहा था।

” मुझसे क्या दुश्मनी है तुम्हारी ? ” उसने फिर पूछा।

” तुमसे और दुश्मनी ? ” मैंने हंसकर कहा।  ” मैं तो तुम्हे जानता तक नहीं। ” उसने मुझे प्रश्न भरी निगाहों से घूरकर देखा। ” ठीक है, ठीक है। तुम मेरी ज़िन्दगी हो और तुम्हे मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता। किन्तु मैं ये भी जानता हूँ कि मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है। “

” दोस्ती भी तो नहीं है ” उसने बिना कोई रूचि लेते हुए कहा। ” और तुम तो नफरत करते हो मुझसे ! “

” नहीं मैं तुमसे नफरत ……….”

” करते हो। ” उसने मेरी बात काटते हुए कहा। ” पर मुद्दा ये है कि सिर्फ मुझसे ही क्यों करते हो ? “

मैं शांत था। शायद उसी के मुँह से जवाब सुनना चाहता था।

“बोलो।  शांत क्यों हो ? “

” कहने को कुछ बचा नहीं अब। “

” कहने को नहीं पर करने को बहुत कुछ है “

” मतलब ? “

” तुम जानते हो तुम्हे क्या करना है।  मुझे तुमपे पूरा विश्वास है। अब मुझे जाना होगा। ” इतना कहकर वो मुझे सवालों के घेरे में ही छोड़कर चली गयी। कुछ लोगों ने वो अर्थी उठाई, मेरी तरफ देखकर मुस्कुराये और चले गए।

मेरी ज़िन्दगी की मईयत्त निकल चुकी थी। मैं सुबह नींद से जागा तो वहाँ कोई कोहरा नहीं था। मेने राहत की सांस ली। मैं अपने कमरे से बाहर आया तो देखा कि मेरा बस्ता किसी ने बांधकर रखा हुआ है।  उसके अंदर मेरे कपड़े और सब ज़रूरी सामान था। शायद मैंने ये सब नींद में किया था। कुछ किताबें भी डाली थी मैंने सफर के लिए।  पर जाना कहाँ था ? मुझे कुछ ज्ञात नहीं था। बगल में टेबल के ऊपर एक कागज़ उलटा पड़ा हुआ था।  टिकट जैसा लग रहा था। टिकट के बगल में मेरी बाइक की चाबी थी। मैं टिकट उठाने ही वाला था कि मेरा फ़ोन बजा। मेरे दफ्तर से कॉल था। आज सोमवार था, काम का दिन।  मैंने टिकट वापस रखी और चाबी उठाई। अब मुझे चयन करना था मैं क्या करुँ। और सच कहुँ तो मैं बड़ा ही उलझन में था। 

तो मैं बस वहाँ सुन्न सा खड़ा होकर अपनी ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल फैसला लेने वाला था। मेरे एक तरफ मेरा बस्ता था, तो  दूसरी तरफ बजता हुआ फ़ोन। और ज़िन्दगी की तो मईयत्त निकल ही चुकी थी।

मज़ार-ए-इश्क़

मज़ार-ए-इश्क़ में शरीक होना जरूरी है क्या?
कीमत-ए-जायदाद के लिए उसे खोना जरूरी है क्या?
जिसने तुम्हे हर पल बस हंसना सिखाया
ऐसे शख्स की मईयत्त पर रोना जरूरी है क्या?