Karna

This poem depicts the scene from Mahabharata epic when Karna was killed.

गिरा जो रुधिर वीर का धरा पर
माधव को भी ये एहसास हुआ
कि जिसकी खातिर उतरे थे रण में
उसी धर्म का उनसे उपहास हुआ

श्रेष्ठ था युद्धकौशल में वो
दानशीलता के गुण से विख्यात हुआ
दान-धर्म ही बना मौत का कारण
प्रभु ये कैसा अभिशाप हुआ

एक ही माँ की कोख से जन्मे सब
कुछ पांडव कहलाये, वो सूतपुत्र बदनाम हुआ
अरे निहत्थे पर बाण चलकर
पार्थ ! तुझे ये कैसा अभिमान हुआ

दिनकर क्यों छुपते हो अब बदल के पीछे
पितृधर्म का तुमसे है संहार हुआ
ज्ञात होते हुए भी देवराज का छल
क्यों कवच-कुण्डल देने को पुत्र ये लाचार हुआ

एक मित्र की खातिर लड़ा जो कुटुंब से
ऐसे योद्धा की मृत्यु का साक्षी पूरा इतिहास हुआ
श्याम! जिसकी खातिर उतरे थे तुम रण में
उसी धर्म का तुमसे उपहास हुआ

इश्क़ करने का अक्सर यही अंजाम होता है
के कुछ वक़्त बाद, साथी सिर्फ ज़ाम होता है
केवल मुजरिम ही नहीं बुरे दुनिया की नज़र में
हम आशिक़ो का भी नाम बहुत बदनाम होता है
तुम कहते हो की ज़िन्दगी में कुछ करो, आगे बढ़ो
बताओ, हम जैसों को मोहब्बत के सिवा और क्या काम होता है
कामयाब और मशहूर होने से यार मिल जाएगा
ऐ दुनिया तेरे यह तो इश्क़ का भी दाम होता है
हिदायत मिलती है कि ये सब छुप छुप के करो
अरे तेरे शहर में तो क़त्ल भी सरेआम होता है

मज़ार-ए-इश्क़

मज़ार-ए-इश्क़ में शरीक होना जरूरी है क्या?
कीमत-ए-जायदाद के लिए उसे खोना जरूरी है क्या?
जिसने तुम्हे हर पल बस हंसना सिखाया
ऐसे शख्स की मईयत्त पर रोना जरूरी है क्या?