इतना बुरा हूँ कि खुद की
संगति में ही बिगड़ रहा हूँ
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टपरी
चलो आज फिर इश्क़ वाली टपरी जाया जाये
तेरे लबों से चाय की सिसकियाँ लेनी हैं मुझे
तू है
है तू दरिया , तू है महताब
तू साया , तू ही आफताब
चल राख उठा
और रगड़ माथे पर
धरती को अभी
कंपकपाना है
पसीने से बनाते
है नाम यहाँ लोग
तुझे तो आखिर
लहू बहाना है


