


Sometimes we have to fight for ourselves
Sometimes we have to fight with ourselves

अब तो हर रात की यही कहानी होती जा रही है
थोड़े आंसू निकलते हैं पर किताब पूरी होती जा रही है
रंजिशे तो बहुत करते हो तुम
मुझे सलीखे सीखाने की
जाओ पहले तालीम तो लेकर आओ
मुझसे दुश्मनी निभाने की
इतना बुरा हूँ कि खुद की
संगति में ही बिगड़ रहा हूँ
चलो आज फिर इश्क़ वाली टपरी जाया जाये
तेरे लबों से चाय की सिसकियाँ लेनी हैं मुझे
है तू दरिया , तू है महताब
तू साया , तू ही आफताब
चल राख उठा
और रगड़ माथे पर
धरती को अभी
कंपकपाना है
पसीने से बनाते
है नाम यहाँ लोग
तुझे तो आखिर
लहू बहाना है